हीरापुर गांव में पारंपरिक पद्धति से मनाया गया बैल पोला: 100 बैल जोड़ियों के साथ हुई बाघ देव की पूजा

            ✍️भरत घासले 
ग्रामीण अंचलों में आज भी हमारी प्राचीन संस्कृति और पारंपरिक पद्धतियां पूरी जीवंतता के साथ सुरक्षित हैं। इसका अनूठा उदाहरण गोंदिया जिले के गोरेगांव तहसील अंतर्गत हीरापुर गांव में गुरुवार 10 सितंबर को देखने को मिला, जहां सदियों पुरानी परंपरा को निभाते हुए बैल पोला का त्योहार बेहद हर्षोल्लास और पारंपरिक ढंग से मनाया गया। आधुनिकता और यांत्रिकीकरण के इस दौर में, जहां खेतों से बैल गायब हो रहे हैं, वहीं हीरापुर में 100 से अधिक बैल जोड़ियों ने इस उत्सव में भाग लेकर सबको अचंभित कर दिया। 
*बाघ देव की पूजा के साथ त्योहार की शुरुआत* 
कृषि प्रधान संस्कृति के इस पावन पर्व पर हीरापुर निवासी प्रगतिशील किसान तथा पूर्व उपसभापति सुरेंद्र उर्फ बबलू बिसेन, पूर्व सरपंच सतीश रहांगडाले  तथा किसानों ने  बताया कि, सबसे पहले अपने बैलों को सुबह घर या तालाबों में ले जाकर अच्छी तरह नहलाया जाता है। इसके बाद बैलों के सींगों पर तेल-रंग लगाया गया और उन्हें आकर्षक वस्त्रों (झूल) व आभूषणों से सजाया गया। इस उत्सव की सबसे अनूठी विशेषता यहाँ की  ग्राम के पटेल के यहां से आरती निकालकर ग्राम देवता माता माय,  बाघ देव की विशेष पूजा कर शुरुवात की गई। ग्रामीणों और किसानों ने एकत्रित होकर प्रकृति और मवेशियों की रक्षा करने वाले आराध्य बाघ देव की पारंपरिक पद्धति से पूजा-अर्चना की और अपने पशुधन की सुख-समृद्धि व सुरक्षा की मन्नत मांगी। 
 *पारंपरिक पद्धति से भरा भव्य पोला* 
दोपहर बाद गांव के पुराने चौपाल और मैदान में तोरण (आम के पत्तों की रस्सी) बांधकर भव्य पोला भरा गया। सजी-धजी 100 बैल जोड़ियों को एक कतार में खड़ा किया गया, जो देखने में बेहद विहंगम और गौरवशाली प्रतीत हो रहा था। गांव के प्रतिष्ठित नागरिक और बुजुर्गों द्वारा पहली जोड़ी की पूजा ग्राम पंचायत तथा ग्रामीणों के सहयोग से सभी बैल जोड़ी मालिकों को दुपट्टा देकर उनका धन्यवाद व्यक्त किया गया । उसके बाद तोरण तोड़ा गया, जिसके बाद पूरा मैदान 'पोला-पोला, हर हर महादेव' के जयकारों और पारंपरिक गीतों (झड़ती) से गूंज उठा। इस अवसर पर बच्चों ने भी मिट्टी और लकड़ी के बने 'नंदी बैल' (खिलौनों) की पूजा की और उत्सव का आनंद लिया। 
*यांत्रिकीकरण के दौर में मिशाल बना हीरापुर* 
आजकल खेती में ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों की संख्या लगातार घट रही है। कई गांवों में तो पोला मनाने के लिए बैल जोड़ियां भी मुश्किल से मिलती हैं। ऐसे संकट के समय में भी हीरापुर गांव के किसानों ने अपनी 100 बैल जोड़ियों को सहेज कर रखा है। हीरापुर का यह पारंपरिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध कृषि संस्कृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सीख देता है। त्योहार के समापन पर हर घर में पारंपरिक पकवान 'पूरन पोली' बनाई गई और बैलों को विशेष भोग खिलाया गया

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